जाड़ा आया, जाड़ा आया |
रंग बिरंगे कपड़े लाया ||
कम्बल ,लोई और दुशाले |
फिर से बाहर गए निकाले ||
गुलुबन्द ,मोज़े ,दस्ताने |
नये नये मंगवाये माँ ने ||
पहन रजाई का पैजामा |
सी -सी करते आये मामा ||
धूप लगी लड़कों को भाने |
आग लगी अति आदर पाने ||
भगती भैंस देख अब पानी |
दिन चढ़ता तब उठती नानी ||
नहीं भाड़ से अब घबराता |
भड़भूजा है मौज उड़ाता |
मुर्गे से पहले चिल्लाते |
तड़के ही हैं बाबा गाते ||
दिन हो गया सिकुड़ कर छोटा |
गोभी फूल उठी ज्यों लोटा ||
कमरख ,नारंगी ,झरबैले |
हैं अमरुद ,शरीफे फैले ||
हरी घास धोती जाती है |
लाखों मोती बिखराती है ||
उसमें सुबह न चलता कोई |
साबुन बहुत न मलता कोई ||
कुहरा पड़ता ,पड़ता पाला |
ओस भरा मकड़ी का जाला ||
दिखता है इस तरह सुहाना |
ज्यों चांदी का ताना बाना ||
ऊँगली तो जाती है अकड़ी |
कलम नहीं जाती है पकड़ी ||
बन्द करो अब लिखना भाई |
चलो धूप है छत पर छाई ||
(शिशु नवम्बर 1932)
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