नाम : ठाकुर श्रीनाथ सिंह
पिता का नाम : कामता सिंह
जन्म स्थान : ग्राम व पोस्ट मानपुर तहसील बारा जिला इलाहाबाद उ.प्र.
जन्म तिथि :१९०१-१-अक्टूबर
संपादन : दैनिक देश बंधु
शिशु वर्ष१९२१-२७
बाल सखा वर्ष १९२७-४५
सरस्वती वर्ष १९३३-३८
हल १९३९
दीदी १९४४-५३
बाल बोध
क्योंकि उन दिनों ( १९२०) बाल साहित्यकारों का एक प्रकार से सर्वथा अभाव था ,इसलिए मैंने अनेक नामों एवं उपनामों से बहुतेरी रचनाएँ लिखी थीं |कुछ नाम ये हैं ,श्रीश ,लालसखा,बालक कवि,लालकवि, कुसुम कुमारी देवी कलि ,खरमस्त ,श्रीपत ,लक्ष्मीकान्त वर्मा ,अरुणप्रकाश विशारद ,विनोद शर्मा ,जयदेवी एवं अन्य अनेक |(श्रीनाथ सिंह द्वारा लिखित भूमिका से ,इसी ब्लॉग में)
उपन्यास : जागरण ,प्रजामंडल एक और अनेक ,एकाकिनी ,झाँसी की रानी, सोमनाथ, राधारानी, नयनतारा, कवि और क्रान्तिकारी, अपहर्ता, अपराधिता,छमा,प्रेम परीक्षा|
बाल रचनायें : बाल कवितावली, खेलघर, बालभारती, मीठीतानें, गुब्बारा ,गरुड़ कन्या, सुनहरी नदी का देवता, परिदेश की सैर |
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निवेदन
श्रीनाथ सिंह
१९ वीं सदी के साथ हिंदी में बाल
साहित्य का भी उदय हुआ | १८ वीं सदी के अंत तक , जिन्हे हम हिंदी भाषी प्रदेश कहते
हैं , वहां उर्दू का प्रचलन अधिक था | लिपि भी फारसी थी , जनजागरण के साथ अपनी एक भाषा की भावना भी जन मानस में
उठी | पहले तो यही प्रयास शुरू हुआ कि जो कुछ फारसी लिपि में लिखा जाता है वह
देवनागरी लिपि में भी लिखा जाए और सरकार जैसे उर्दू लिपि को मान्यता देती है वैसे
ही देवनागरी को मान्यता दे | इसी उद्देश्य से बनारस में महामना पंडित मदन मोहन
मालवीय के नेतृत्व में नागरी प्रचारणी सभा की स्थापना हुई | कहना न होगा कि
तत्कालीन सरकार ने जनता की यह मांग स्वीकार कर ली और सभी अदालतों में उर्दू लिपि
के साथ नागरी लिपि का भी प्रयोग समानांतर रूप से शुरू हुआ | भाषा तब भी उर्दू ही
थी |
जिस तरह जनता में अपनी लिपि की मांग
बढ़ी उसी तरह भाषा के स्वरुप की भी मांग बढ़ी और इलाहाबाद में हिंदी साहित्य सम्मेलन
की स्थापना हुई और जहाँ उर्दू में फारसी शब्द बाहुल्य था वहीँ हिंदी साहित्य में
संस्कृत शब्दावली का प्रयोग शुरू हुआ , इस तरह एक ही भाषा की दो शैलियाँ हिंदी
उर्दू के नाम से बन गईं | यह शैलियाँ तब तक मान्य रहीं जब तक भारत का शासन विधान
नहीं बन गया और हिंदी , उर्दू समेत चौदह रास्ट्रभाषाओँ को मान्यता नहीं मिली | यों
तो भारतवर्ष में बोलियों की सैकड़ों जातियां और उपजातियां हैं परन्तु मान्यता उन्ही
को मिली जिनकी अपनी स्पष्ट लिपि भी हैं | इस तरह हिन्दी और उर्दू एक ही भाषा की दो
शैलियाँ थीं अब दो स्वतंत्र भाषाएँ हैं | स्पष्ट है कि भाषा के नाम पर पहले उर्दू
का प्रचलन काफी था और बच्चों के लिए पहले
पहल उर्दू में ही तुक बन्दियां शुरू हुईं क्रमशः उन्ही तुक बन्दियों ने हिंदी बाल
कविता का रूप ले लिया |
भारतेंदु बाबू हरिश्चन्द्र , जो
आधुनिक हिंदी के जनक कहे जाते हैं ने जहाँ बृजभाषा,अवधी आदि बोलियों से उपर उठकर
पद्य रचना की वहां उन्होंने बच्चों के लिए अलग से किसी साहित्य की आवश्यकता नहीं
समझी | बच्चों की पाठ्य पुस्तकों में भी गद्य की भाषा जहाँ आधुनिक परिष्कृत हिन्दी
थी वहां पद्य की भाषा अवधी ,बृजभाषा आदि ही थी | क्रमशः श्री मन्नन द्विवेदी
गजपुरी ,श्रीधर पाठक, सुखराम- -चौबे गुणाकर ,कामता प्रसाद गुरु , बद्रीनाथ भट्ट
आदि ने हिन्दी में कुछ तुकबन्दियाँ लिखीं
और प्रकाशित कीं | उन्ही सब को हिन्दी बाल साहित्य का जनक कहा जा सकता है |
मैंने जब अपना लेखकीय जीवन प्रारम्भ
किया तब मेरे सामने हिन्दी बाल साहित्य के यही कवि थे और उस समय भारत में जनजागरण ,भाषा ,भक्ति, साहित्य सृजन की आंधी सी
आई थी जैसे और छेत्रों में वैसे ही बाल
साहित्य के छेत्र में भी | स्वभावतः ही उस समय के पत्रकारों का ध्यान
तत्कालीन पाश्चात्य देशों में विकसित बाल साहित्य खासकर बाल कविता के सृजन की ओर
गया और जैसे अंग्रेज कवि आदि अपनी इर्द गिर्द की बच्चों की सहज जानकारी के विषयों
के बारे में तुक जोड़ा करते थे वैसे ही यहाँ भी तुक बन्दियां शुरू हुईं परन्तु
क्योंकि वह जनजागरण का युग था इसलिए प्रयास
यह हुआ कि जैसे अन्य कवितायेँ ,वैसे ही बच्चों की कवितायेँ कोरी तुक बन्दियां न
हों , उनमे पंक्तियाँ सहजबोध हों , तुक मनभावन हों ,भावनाएं प्रबल हों , देशभक्ति , चरित्र निर्माण इन सभी
बातों का संकलन हो जो बच्चों को देश की तत्कालीन आवश्यकताओं के अनुरूप नये
नागरिकों के रूप में ढालें |
मैंने उस संक्रांति काल में जो
कवितायेँ लिखनी शुरू कीं और क्रमशः १९६० तक लिखता रहा उन सब के पीछे मेरी यही
भावना थी क्रमशः मेरी रचनाएँ शिशु और बालसखा में छपना शुरू हुईं और में उन पत्रों
का संपादक नियुक्त हो गया | क्योंकि उन दिनों बाल साहित्यकारों का एक प्रकार से
सर्वथा अभाव था ,इसीलिए मैंने अनेक नामों एवं उपनामों से बहुतेरी कवितायेँ ,
कहानियां ,एवं लेख लिखे | कुछ नाम ये हैं –श्रीश , खरमस्त
, लालसखा , बालकवि ,कुसुम कुमारी देवी कलि , लक्षमीकान्त वर्मा ,श्रीपत , जयदेवी
और अन्य अनेक | बच्चों के साथ साथ मैंने स्त्रियों के लिए भी उस समय की तत्कालीन
स्त्री पाठ्य पुस्तकों में भी “एक नव विवाहित वधु “ कुसुमकुमारी देवी कलि , श्यामाबाई , लछमी कान्त वर्मा ,आदि नामों से लेखन
शुरू किया | “एक नव विवाहित वधु “ और “कुसुम कुमारी देवी कलि “ इन दो नामों से ज्यादा लेख लिखे गए
थे और ये लेख जनता को कितने पसंद आये थे , इस बात का अनुमान इसी एक बात से किया जा
सकता है कि अनेक सम्पादक , कवि और लेखक इन कल्पित
व्यक्तियों से पत्र व्यवहार करने और मिलने के लिए उन दिनों बराबर उद्योग
करते रहते थे | इन लेखों को बाद में पुस्तक रूप में पण्डित भगवती प्रसाद बाजपेई ने
साहित्य मंदिर, दरागंज , प्रयाग से सन १९३० में प्रकाशित किया |
सन १९२५ में मैं दैनिक देशबन्धु का भी
संपादन करने लगा था परन्तु उसके साथ ही पंडित सुदर्शनाचार्य के प्रेस पर जिसमे यह
पत्र छपता था अंग्रेज सरकार की गाज गिरी और उसके सब प्रकाशन बंद हो गए लेकिन
पण्डित सुदर्शनाचार्य एवं उनकी धर्म पत्नी
श्रीमती गोपलदेवी के प्रयासों से मुझे श्री हरि केशव घोष जो उस समय इंडियन प्रेस
प्रयाग के संचालक थे से मिलने का सौभग्य प्राप्त हुआ और उन्होंने मुझे बालसखा का
संपादक नियुक्त कर दिया | उस समय उनके मुख से जो शब्द निकले थे वे आज भी मेरे
कानों में गूँज रहे हैं –“बालसखा को तुम बनाओगे , तो बालसखा तुम्हे बनाएगा | उनके इस
एक वाक्य से मुझे इतनी प्रेरणा मिली कि मैं जी जान से बालसखा के सम्पादन कार्य में
जुट गया |
पंजाब टेक्स्ट बुक कमेटी बालसखा की
१००० प्रतियाँ खरीदती थी | परन्तु मैंने जब बालसखा में राष्ट्रीय कवितायेँ और नेताओं के
चरित छापने आरम्भ किये ,तो उसने आश्वासन माँगा कि बालसखा में आगे ऐसी रचनाएँ नहीं
छापी जाएँगी | श्री हरिकेशव घोष जिन्हे हम सब पटल बाबू के नाम से ज्यादा जानते थे
के कमरे में मैं इस सम्बन्ध में आदेश लेने पहुंचा , तो देखा कि उनका चेहरा गंभीर
है | मैं डरा कि मुझसे कोई भारी भूल हुई है पर तुरंत ही उन्होंने मुझे निश्चिंत कर
दिया | बोले “ तुम्हारा कोई दोष नहीं है, प्रत्येक भारतीय को अब
निर्णय करना पड़ेगा की वह क्या करे , क्या न करे |” पटल बाबू
पंजाब टेक्स्ट बुक कमेटी को यह आश्वासन न
दे सके कि बालसखा में आगे राष्ट्रीय कवितायेँ और नेताओं की जीवनियाँ नहीं छपेंगी |
परिणाम यह हुआ कि पन्जाब टेक्स्ट बुक
कमेटी ने बाल सखा लेना बंद कर दिया | फिर तो हम बिलकुल निश्चिन्त हो गए और
बालसखा के राष्ट्रीय रूप को स्वयम पंडित नेहरु ने इतना पसंद किया कि उसे अपनी
पुत्री इंदिरा नेहरू के नाम जारी करने की आज्ञा दी और स्विटज़रलैंड से लौटने पर
इसमे बच्चों के मनोरंजन के कई लेख लिखे |
बालसखा का काम मैं प्रायः एक सप्ताह
में समाप्त कर देता था और पटल बाबू से और काम मांगता था | इससे वे बहुत प्रसन्न
होते थे और उनके पास जो भी साहित्यक फुटकर काम होता था, मुझे बुला कर देते थे | एक
समय तो एसा आया ,जब इंडियन प्रेस से प्रकाशित होने
वाले प्रत्येक पत्र – पत्रिका पर संपादक के रूप में मेरा नाम छपने लगा | सन
१९४० में मैंने पटल बाबू से “ दीदी “ नाम की अपनी
निजि पत्रिका प्रकाशित करने की अनुमति मांगी जो उन्होंने सहर्ष दे दी | उन्होंने
दीदी को चार वर्षों तक इंडियन प्रेस में मौजूद अच्छे ब्लाक मुफ्त दिए और एक पृष्ठ
का विज्ञापन भी दिया | चार वर्ष बाद जब दीदी एवं बाल बोध’ स्वाबलंबी हो
गयीं , मैंने उनसे इंडियन प्रेस से प्रथक होने की अनुमति मांगी और उन्होंने मुझे
आशीर्वाद तथा शुभ कामनाओं के साथ विदा किया | आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो समझ
नहीं पता हूँ की मेरे जैसे साधारण व्यक्ति को इन सभी महा पुरषों का स्नेह व
सानिध्य कैसे प्राप्त हुआ जिससे कि मैं अपना समस्त साहित्यिक कार्य कर पाया |
(
इन कविताओं के चयन में एक दृष्टिकोण यह भी रहा है कि यह कवितायेँ एक विशाल देश और लम्बे समय की चौखट में
बांधी जा सकें , जिससे कि वर्तमान पीढ़ी के बच्चे ही नहीं , आने वाली पीढ़ी के ,मैं तो यहाँ तक कहने की धृष्टता करता हूँ कि
जब तक अपनी यह हिंदी भाषा रहे तब तक बच्चे इन्हें पढ़ते , इनका आनंद लेते और इनके
प्रकाश में अपना मार्ग प्रशस्त करते रहें | )
०१-०१-८९
श्रीनाथ सिंह
प्रस्तुति – पुष्पेन्द्र सिंह
( नेहरु म्यूजियम
और लाइब्रेरी नई दिल्ली द्वारा श्रीनाथ सिंह के इंटरव्यू – यौवन ,
सौंदर्य और प्रेम , लेखक ठाकुर श्रीनाथ सिंह प्रकाशक साहित्य मंदिर , दारागंज
प्रयाग जनवरी १९३० में लिखत भूमिका एवं पटल बाबू के देहावसान के बाद सरस्वती के
श्रधांजलि अंक में प्रकाशित लेख “ पटल बाबू “: एक संस्मरण – ठाकुर श्रीनाथ सिंह के आधार पर )
पुष्पेंद्र जी,
ReplyDeleteनमस्कार ! अपने परिचय के लिहाज से कहूँ तो हालाँकि मैं कोई लेखक या साहित्यकार नहीं पर हाँ, बालसाहित्य को लेकर रुचि जरूर रखता हूँ. इससे जुड़ी चीजें मुझे लुभाती भी है और खींचती भी. मौजूदा दौर में चल रही बालसाहित्य की दुनिया को लेकर मुझे चिंता होती है; इसकी तमाम गतिविधियां अक्सर कचोटती भी हैं और कई बार मन में आता है की इस पर कुछ किया जाये।
बहरहाल, अभी नेट की दुनिया खँगालते हुए अचानक आपके द्वारा संरक्षित किये ठाकुर साहब के खजाने तक पहुंचा तो हतप्रभ रह गया. शुरुआती दौर के इस महान लेखक का इतना काम वह भी एक जगह मिलना सचमुच हिलाने वाला लगा. जिस तरह यहाँ आपने इतनी चीजें सहेजी और संजोयी हैं; वह सचमुच अपने हिंदी बालसाहित्य की दुनिया की असल झाँकी दिखाने की ओर ले जाने वाला एक पहला कदम नजर आता है.
एक एक कर आपकी सहेजी इन रचनाओं को देख-पढ़ रहा हूँ. जल्द ही पुनः आपके साथ इस काम पर अपने मन की बातें रखूँगा।
Dear Pushpendra ji,
ReplyDeleteThis is a wonderful thing you have to preserve and keep alive the works of Thakur Srinath Singh, one of the doyens of the children's literature in India.
I would like to get in touch with you in this context. Will it be possible for you to reply with your contact number at my email so that we can take this conversation forward.
I look forward to hearing from you.
Warm regards,
Pranav Kumar Singh
Publisher
Ponytale Books
I am glad to know that you appreciated our work and wants to get in touch with us.
DeleteI have emailed you my contact details at your mail Ponytalebooks@gmail.com.
Thank you.
पुष्पेन्द्र जी,
ReplyDeleteनमस्कार !
आशा है, अच्छे से होंगे।
यहाँ मैं 'प्रेमचंद : कुछ संस्मरण' किताब की पीडीऍफ़ प्रति संलग्न कर रहा हूँ।
इसमें अन्य रचनाकारों के साथ ठाकुर जी द्वारा प्रेमचंद जी पर लिखा संस्मरण - 'मुंशी प्रेमचंद' भी है।
कृपया देखें। संभव है आपके लिए यह उपयोगी रहेगा।
शुभकामनाओं के साथ
चन्द्रप्रकाश
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BAHUT ACHHA LIKHA H APNE
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