सूरज की वे सुन्दर किरणें,
रोज सुबह जो हमें जगातीं|
वर्षा की वें अगणित बूंदे ,
सारे जग को जों नहलातीं |
हरे भरे वे खेत सुहाने ,
जिनमे हिरन चौकड़ी भरते |
हैं सबके सब उस रोटी में ,
जिसको हम तुम खाया करते |
जब जाता हूँ भोजन करने ,
तब यह होता अनुभव भारी |
सूरज की वे सुन्दर किरणें,
वर्षा की वे बूंदे प्यारी |
हरे भरे वे खेत सुहाने ,
हिरन चौकड़ी भरते जिनमे |
मैं खाता हूँ ,मैं खाता हूँ
बात यही उठती है मन में |
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